5.28.2006
12.11.2005
अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?
आदर्शवादी संस्कारो को तीन श्रेणीओं में बाँटा जा सकता है. पहेली श्रेणी में वे संस्कार आते हैं जो सार्वभौमिक होते हैं, जो आपने, मैने और सारी दूनिया के बच्चों ने बचपन से सिखे हैं - झूठ न बोलना, चोरी न करना वगेरे. बाकी जिन्दगी में इनका कौन कितना पालन करता या कर पाता है यह अलग बात है.दूसरी श्रेणी में वे संस्कार आते हैं जो अपने समाज और परिवार की पृष्ठभूमि से आते हैं या सिखाये जाते हैं. ये नियम परिवार और समाज के हितों की रक्षा में बनायें जाते हैं और अपेक्षा रहती हैं कि हर कोई इनका पालन करेगा. ये नियम खान-पान, बोल-चाल और शादी-ब्याह आदी को नियन्त्रीत करते हैं. काल, स्थल और परिस्थिति वश इनमें परिवर्तन आता ही हैं, नहीं तो विद्रोह पूर्वक इन्हे बदला जाता हैं. अगर निजी जिन्दगी की बात करूँ तो, मेरे दादाजी की शादी तय हुई तब उनकी मर्ज़ी कोई मायने नहीं रखती थी वहीं मेरे पिताजी को कम से कम शादी पूर्व अपनी होने वाली पत्नी को देखने का मौका दिया गया था. प्रेम विवाह तो तब संस्कार के विरूद्ध माना जाता. लेकिन मेरी शादी प्रेम विवाह थी, वो भी अंततः सभी की मर्ज़ी पा कर ही सम्भव हो सकी. हर कोई संस्कारो और नियमों में वहीं तक छूट देना चाहता हैं जहां तक खुद को सही लगता हैं. जैसे मैं अपने बच्चे को 'लिव इन रिलेशनशिप' तक ही छूट देना चाहूँगा. पूजा-पाठ को भी संस्कारो में माना जाता हैं, जो इनका नियम पूर्वक पालन करता हैं उसे संस्कारी माना जाता हैं. पिताजी इस मामले में पक्के हैं और मुझ सें भी यही उम्मीद रखते हैं, जानते हुए भी कि मैं अनइश्वरवादी हूं इस आशा में कि देर सवेर घर के संस्कार काम आयेंगे और मैं सुधर जाऊंगा. एक समय में हमारे गांव में सायकिल चलाना, सिनेमा देखना, लड़कियों से बात करना, अपने बच्चे को नाम लेकर बुलाना और गोद में उठाना (!!!), सर पर टोपी या पगड़ी न रखना आदि असंस्कारी कार्य होते थे और आज ये विचार धक्कियानुसी लगते हैं. समय के साथ पिताजी ने हि इन्हे तिलांजली दे दी थी सो हमे इनके पालन करने की नौबत ही नहीं आयी.लेख लम्बा न हो इस लिए अब तीसरे प्रकार के संस्कारों पर आता हूं. ये हैं व्यक्ति विशेष द्वारा अपने लिए ही अपने विवेक सें नियम तय करना और आशा करना कि स्वयं तथा उसके बीवी-बच्चे इनका पालन करेंगे. ये नियम सब के लिए अलग अलग हो सकते हैं तथा इनमें 'खुद सही और बाकि सब गलत' वाला भाव रहता हैं. ये नियम कुछ इस प्रकार के होते है- शराब-सिगरेट का सेवन करे ना करे, व्यापार-धंधे में कितना झूठ और चोरी जायज होंगे वगैरे. इनमें समय के साथ परिवर्तन होता रहता हैं और मुग़ालता में जीते रहते हैं कि हम संस्कारो का पालन करते हैं और इनके पक्के है.
12.04.2005
आपकी शराब, आपको मुबारक.
श्रीमान माल्या साहब, अरे! आप इन्हे नहीं जानते? याद कीजिये.हां, याद आयाना. ये व्यापारी हैं, शराब बनाते हैं. सांसद हैं, क्योंकि हमारे यहां आपकुर्सी ख़रीद सकते हैं. ये खास बिकनी स्पेशल केलेन्डर भी प्रकाशित करतेहैं, अपने खास लोगों के लिए. इतना कुछ केवल उनके परिचय हेतू लिखा हैं,मेरी उनसे कोई व्यक्तिगत खुन्नस नहीं हैं.हां तो मुद्दे पर आता हूं. माल्याजी पधारे थे हमारे शहर. IIM(Ahmedabad)के सेमिनार में हिस्सा लेने. तो? तो ये कि उन्होने राय व्यक्त कि कीशराब-बन्दी जो यहां हमेशा से चली आयी हैं, की कोई आवश्यकता नहीं हैं.खाम-खां सरकार अपना २५०० करोड़ का नुकसान करवा रही हैं.ये पैसा सड़को आदिको बनाने में खर्च किया जा सकता हैं.इस पर मैं गुस्ताखी करते हुए कहना चाहूँगा की जनाब आपको तकलीफ़ यह नहींहैं की सरकार को २५०० करोड़ का नुकसान(??) हो रहा हैं, तकलीफ़ यह हैं की,इससे भी कई गूणा रकम आप दारु पीला कर नहीं कमा पा रहे.जनाब गुजरात की सड़को का हाल बुरा नहीं हैं. यहां सड़के और बिजली कभीचुनावी मुद्दा तक नहीं रहती. गुजरात की विकास दर बाकी देश की विकास दरसें २% अधिक ही रही हैं.यहां न तो देशी शराब के ठेके दिखते हैं, न बीयर बार और न ही सरे आम लोगदारु पीते दिखते हैं. यह सब इतना सकुन देता है कि इसके आगे २५०० करोड़ किकोई किंमत नहीं हैं.माल्या साहब आप हमारे यहां से हवाई जहाज़ उङाईये, आपका स्वागत हैं. आपकी शराब, आपको मुबारक.
11.30.2005
वर्ग पहेली मिल रही है चुनौति

वर्ग पहेली तो आप भरते ही होंगे. भई हमे तो चसका सा है, कभी कभी पूरी न भर पाये तो दिनभर बेचेनी बनी रहती है. जब कभी मित्र का फोन आये कि यार एक शब्द नहीं सुझ रहा बता दो तो पहेली पूरी हो जाये. लो क्यों नही बतायेंगे भाई? पूछा भी तो ज्ञानी जनो से जाता है, हम सगर्व आगे-पीछे, ऊपर-नीचे के शब्द पूछ कर वाजिब जवाब बताते है.
वर्ग पहेली यानी क्रोसवर्ड सबसे पहले न्यूयोर्क वर्ळ्ड नामक अखबार ने सन् १९१३ में प्रकाशित की थी. इसके लोकप्रिय होने से अन्य अखबारो ने भी नकल शुरू कर दी. तबसे आज तक इसकी लोकप्रियता बनी हुई है. हमारी भारतीय भाषाओं के अखबारों में भी वर्ग पहेली अनिवार्य सी हो गयी है.
पर अब इसके एकसत्र राज को चुनौति मिल रही है एक जापानी पहेली से जो तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह है सुडोकू. सन् २००४ में लन्डन टाइम्स ने इसका प्रकाशन शुरू किया था और आज इतने कम समय में यह पहेली दूनियाभर में बेहद लोकप्रिय हो रही है. भाषाओ कि सीमाओं से परे सुडोकू गणित पर आधारित है. इसमे १ से ९ अकों को ९ वर्गो में भरना होता है, जो वापीस ९-९ वर्गो में विभाजित होते है. देखिये आपके अखबार मे भी यह पहेली छ्पी हुई होगी, तो खाली समय में माथापच्ची करने में क्या बुराई है.
11.28.2005
अनुगूँज 15 : हम फिल्में क्यों देखते हैं?

जैसे लोग नाटक-नौटंकी और तमाशे देखते थे, हम सिनेमा देखते है. फिर क्यों न देखे जब इसमें कथा हैं-कहानी हैं, चीर विजेता नायक हैं-मोहक अदाओं वाली नायिका हैं, ग़म भुलाने को हास है-परिहास हैं, झुमने को गीत है-संगीत हैं, भावनाओं में बहने को प्रेम है-विद्रोह है, दिलाशा देते सुखान्त हैं. और हां एक मां भी है. बस इसी लिए देखते हैं सिनेमा.
मनोरंजन के लिए ही सही अभी तक तो सिनेमा बस देखने के लिए देखते थे, पर जब लिखने की बारी आयी तो समझ में आया ऐसा नहीं है. हम अपनी पसंद के हजार दावे करे, जीवन में अब तक कई तरह की फिल्मे देखी है और यह समय तथा परीस्थितीयों ने तय किया कि कौन से विषय-वस्तु वाली फिल्म देखे. नही मानते तो पढ लिजिये.
हमारा बचपन राजस्थान के एक छोटे से गांव में गुजरा जहा सिनेमाघर नही है, और तब तक विडीयो का जमाना भी नही आया था. यानी जीवन के कुछ वर्ष बिना सिनेमा के दर्शन किये गुजर गये. पास का कस्बा हमारे लिये बहुत दूर था, एक बार बङो के साथ जाना हुआ तब देखी 'अनोखा बन्धन'. जब गावं छोड़ शहर आये तो वही सिनेमा देखी जो हमारे मां-बाप देखने जाते और हमें साथ ले जाते. ये 'प्रेमरोग' जैसी कुछ फिल्मे थी.
और जब टीवी आ गया तो मजे हो गये. अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते हुए दूरदर्शन जो भी सिनेमा प्रसारित करता हम अडौसियों-पडौसियों के साथ मिलकर देख लेते.
हाईस्कूल तक आते आते थोड़ी स्वतंत्रता का अनुभव हुआ और इस काल मे ढिशुम-ढिशुम मार्का फिल्मे देखी, जिसमे जेम्स बॉन्ड की फिल्मे भी सामील है. तब भी मिथुन-दा की फिल्मे पसंद नहीं थी. इसी दौरान डरावनी फिल्मो का चसका लगा वो आज भी कायम है. कुछ विदेशी फिल्मो के साथ रामसे बन्धूओ की फिल्मे किशोर अवस्था में मजे से देखी. बेशक डर एक अलग तरह का मजा देता है पर लगता है तब ऐसी फिल्मो मे होने वाला अगंप्रदर्शन भी आकर्षण की वजह रहा होगा. हालाकि राजकपुर की बनायी अगंप्रदर्शन वाली फिल्मे न तब देखनी पसंद थी न आज है. जीवन के २०वें वर्ष में प्रवेशते-प्रवेशते लगने लगा था दूनिया को हम ही बदल कर रख देगें और इस काल में समानान्तर सिनेमा देखना खास पसंद करते थे. इसी दौरान ज्ञान हुआ की परहेज जैसी वस्तु नहीं रखनी चाहिए और साथियों के साथ दो-चार ब्लू फिल्में देख मारी. विडीयो तकनीक का आभार.
उम्र ही ऐसी थी की हमे प्रेम हो गया, जिससे प्रेम हुआ वो आज हमारी पत्नी है. खैर, तब हमें छुप छुपा कर मिलना पङता था, सो सिनेमा देखते थे, चाहे जैसी भी हो.
आने वाले समय में क्या देखेगें कैसे कहे पर आज हम अपनी पसंद की फिल्मे देखते है.
हास्य प्रधान फिल्मे देखना खास पसंद करते है, ताकी तनाव कुछ कम हो.' हेराफेरी' जैसी. गोविन्दा मार्का उतनी पसन्द नहीं पर और कुछ ना हो तो चला लेते है. कार्टून फिल्मे बेटे के साथ चाव से देखते है.
इतिहास से प्रेम रखते है सो ऐतिहासिक सिनेमा भी देखते है. 'गांधी' कई बार देखी है, मौका मिलने पर और देख सकते है. 'सरदार' फिल्म का भी ऐसा ही है.
रामगोपाल वर्मा की फिल्मो का इंतजार रहता है.
अच्छे अभिनय या अच्छे फिल्माकंन को देखने के लिये भी सिनेमा देखते है. पिंजर हमारी पसंद की फिल्म है.
कभी कभी अपने फर्ज़ के बारे में लम्बा प्रवचन सुनने के बाद बीवी के साथ राजश्री और चौपङाजी की फिल्मे झेलते है.
परिवारीक प्राणी होने के कारण सपरिवार 'हम साथ साथ है', 'बागबान' जैसी फिल्मे देखते है और हज़म करने की कोशीष करते है.
कहने का तात्पर्य यह है कि या तो आप सिनेमा देखते हैं, या आपको देखनी पङती है. आप बच नहीं सकते.
11.22.2005
मृत्युदंड पर बहस जारी है
मृत्युदंड पर बहस जारी है. हमारे राष्ट्रपति महोदय भी किसी को फांसी की सजा हो इस पक्ष में नहीं है. बेशक मृत्युदंड अमानवीय है, पर निर्मम हत्या या जघन्य बलात्कार करने वाले को फिर इससे कम क्या सजा मिले?
मानना होगा कुछ अपराधो को होने से रोकने के लिए मृत्युदंड का भय अनिवार्य लगता है. पर सत्य यह भी है की कुछ मामलो में फांसी होने के बाद पता चला कि मरनेवाला बेगुनाह था. क्या उसे फिर से जीवित किया जा सकता है? नहीं.अच्छा हो हत्यारे को आजीवन यानी मृत्यु तक कारावास हो और बलात्कारी की एक ही सजा हो सकती है- नपुन्सक बना दिया जाय.मित्रो, राष्ट्र विरूद्ध षडयन्त्र रचनेवालो और आतंकवादीयों को क्या सजा मिले इस बारेमें तो मै खुद असमंजस में हूं. आपही सुझाये.
मानना होगा कुछ अपराधो को होने से रोकने के लिए मृत्युदंड का भय अनिवार्य लगता है. पर सत्य यह भी है की कुछ मामलो में फांसी होने के बाद पता चला कि मरनेवाला बेगुनाह था. क्या उसे फिर से जीवित किया जा सकता है? नहीं.अच्छा हो हत्यारे को आजीवन यानी मृत्यु तक कारावास हो और बलात्कारी की एक ही सजा हो सकती है- नपुन्सक बना दिया जाय.मित्रो, राष्ट्र विरूद्ध षडयन्त्र रचनेवालो और आतंकवादीयों को क्या सजा मिले इस बारेमें तो मै खुद असमंजस में हूं. आपही सुझाये.
11.21.2005
दामाद आखिर दामाद होता है
दामाद आखिर दामाद होता है. हमारी संस्कृति में दामाद को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. दामाद चाहे कैसा भी हो, अच्छा-बूरा, गोरा-काला, लुल्ला-लन्गडा लेकिन उसके मान-सम्मान, इज्जत-आबरू कि रक्षा की जाती है. यही हमारे संस्कार है, हमारी संस्कृति है. संजय ने पढा अब किसी एयरपोर्ट पर रोबर्ट वढेरा की चेकिन्ग नहीं होगी (दलाई लामा के बाद वे ऐसे दूसरे व्यक्ति है). होनी भी नही चाहिये, वे गान्धी परीवार के दामाद है. इस नाते पूरे देश के दामाद हुए. श्रीमान दामादजी रोबर्टजी वढेरा साहब का कोई मान-सम्मान है की नही?
10.31.2005
धमाके कर वे क्या साबित करना चाहते है?
दिपावली से पहले राजधानी में धमाके कर वे क्या साबित करना चाहते है? दो बाते...एक, भूकंप से आतंकवादीयों को उतना नुकसान नहीं हुआ है जितना सब सोच रहे हैं.दो, आप हजार मानवीय रुख अपनाएं आखीर मे आप सांप को दूध पिला रहे हो.आतंकवाद से लङने का एक ही रास्ता है, इज्ञराइल वाला रास्ता. भारत के पास ऐसी इच्छाशक्ति है?याद करे अशोक ने अहिंसा का रास्ता अपनाया था, एक सर्वश्रेष्ठ मार्ग.लेकिन अंत में राष्ट्र कमजोर ही हुआ. हमारा देश विदेशीयों के हाथो गुलाम हुआ. क्या वे शान्तिप्रिय धर्मनिरपेक्ष शासक थे?नहीं.सबक यही है, शान्ति पूर्वक रहकर विकास करना है तो असभ्य लोगो से ताकत के बल पर निपटीये.
10.05.2005
अब नौ रातो तक यौवन मुक्त मन से गरबे की ताल पर झुमेगा
नवरात्री का त्योंहार शुरू हो गया है, अब नौ रातो तक यौवन मुक्त मन से गरबे की ताल पर झुमेगा. अद्भुत नजारा होता है यहां. रंग बिरंगे पारम्परीक पोशाको में सजे-धजे स्त्री पुरूष देर रात तक दुर्गा कि तस्वीर की परिक्रमा करते हुए गरबा करते है. हालाकी शहरो मे गरबो का व्यवसायीकरण हो गया है, आयोजक बङे पेमाने पर गरबो का आयोजन करते है और इनमे परम्परागत गरबो का मुल स्वरूप ही गायब सा हो गया है. फिर भी शुरूआत दुर्गा की आरती से ही होती है बादमें गरबे शुरु होते है जिसका स्थान जल्दी ही डांडीया ले लेते है. नवरात्री एक ऐसा त्योंहार है जिसमे युवावर्ग पुरे उत्साह के साथ हिस्सा लेता है. न रोक न टोक, बस पुरी रात नाचे गाये. ऐसे मे प्रेमी पंखीओ को मुक्त भी आकाश मिल जाता है. गुजरात के समाज में खुलापन है इस लिये नैतिकतावादीयों की चिल्लापो नही सुनायी देती. आपको आश्चर्य होगा देर रात तक अकेली लङकीयां बेखोफ सङको पर घुमती नजर आयेगी पर छेङछाङ कि कोई घटना नही होती. ऐसा कितनी जगहो पर होता है? गुजरात को बदनाम करने वाले हमसे सबक ले सकते है. इस बार न्यायालय ने जरूर फचङा डालते हुए रात के १०.३० बजे तक ही ध्वनीवर्धको का उपयोग करने की सिमा बांधने कि कोशीश की पर इसका सविनय उल्लंघन होना तय ही था. फिर १२.३० तक की छूट दे दी गयी. वैसे भी जहां हर गली -हर मुहल्ले मे गरबे होते हो वहां आप इस तरह रोक नही लगा सकते. कानुन जनता के लिये है या जनता कानुन के लिये?
10.02.2005
नारदजी की मदद से हमने हिन्दी ब्लोगरो के पत्ते प्राप्त किये
नारदजी की मदद से हमने हिन्दी ब्लोगरो के पत्ते प्राप्त किये और पहंचे हर जगह. क्या देखा? कविताएं, कथा-कहानीयां, कुछ इधर की कुछ उधर की. रसास्वादन किया. तमाम भटकाव के बाद पाया लोग खुब लिख रहे, अपनी भाषामें लिखना उन्हे खुब भा रहा है. प्रसन्नता हुई. राजी मन से घरको लौटे.पर यह तो कोई बात नहीं हूई मियां, हमने ब्लोग की दूनिया में कदम रखा था यह सोच कर की कुछ गम्भीर विषयों पर विभिन्न विचार जानने को मिलेंगे, पर ऐसा कमही देखने को मिला. आश्चर्य है कोई महिला चिट्ठाकार भी नहीं दिखी. हां एक जगह महिलाओ के खतने के बारेमें पढा तो जीभ सूख कर तालवे से चीपक गयी. आधुनिक विश्व में जीने की हमारी खुशफहमी हवा होती लगी. खैर आज भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गान्धी की जन्मजयन्ती है, उन्हे श्रधान्जली. गान्धी होते तो वे भी नेट का उपयोग कर रहे होते.

